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Wednesday, November 8, 2017

Padmavati

सुंदरता खुद जिससे मिलकर,
सुंदरतम हो आई थी।
जिसके मन मंदिर में अपने,
पिय की शक्ल समाई थी।

शील, पतिव्रत की दुनिया को,
जिसने सीख सिखाई थी।
जौहर की ज्वाला में जलकर,
जिसने जान लुटाई थी।

सदियों के गौरव को जिसने,
अम्बर तक पहुंचाया था।
स्वाभिमान को शक्ति देकर,
खिलजी से भिड़वाया था।

जीते जी राणा को चाहा,
और चाह ना उसकी थी।
सत-पथ पे चलती थी हरदम,
सत पे जीती मरती थी।

चित्तौड़ दुर्ग की वह महारानी,
रति से सुंदर दिखती थीं।
उर्वशी, रम्भा सी परियां,
नहीं एक पल टिकती थीं।

कामदेव भी जिसे देखकर,
विचलित सा हो जाता था।
अलाउद्दीन खिलजी उसको ही,
हुरम बनाना चाहता था।

पर वो  बेटी भारत की थी,
प्रण की बड़ी पुजारी थी।
पति के सिवा उसे दुनिया में,
कोई चीज न प्यारी थी।

खिलजी की तो उस पदमण पर,
परछाई भी नहीं पड़ी।
लाज बचाने के खातिर वो,
अग्निकुंड में कूद पड़ी।

मर के अमर हुई महारानी,
तीर्थ बनी चित्तौड़ धरा।
उज्ज्वल क्षत्री वंश हुआ
और राजस्थानी वसुंधरा।

स्वाभिमान की अमिट कहानी,
जन-जन के मन भाती है।
हिन्द देश की शौर्य-पताका,
बन रानी लहराती है।

उसको कामी खिलजी की ये,
आज प्रेमिका कहते हैं।
हैरत है ये अर्थपुजारी,
इस भारत में रहते हैं।

जिनका धर्म इमां पैसा है,
वे क्या जाने मर्यादा।
पैसा लेकर जहां प्यार को,
कर लेते आधा आधा।

राजस्थानी कुल-कानी को,
समझे ऐसी सोच कहाँ।
प्रगतिवाद के इन पुतलों में,
मानवता का लोच कहाँ।

गर इतिहास हुआ खंडित तो,
पीछे क्या बच पाएगा।
संस्कृति का अमृत निर्झर,
जहर सना हो जाएगा।

हर गौरव की थाती को ये,
मनोविनोदी ले लेंगे।
और उसे विकृत कर करके,
फिल्मकहानी गढ़ लेंगे।

अब पानी सर पर है आया,
उठ पतवार संभालो तुम।
डूब न जाए अर्थ-समंद में,
ये इतिहास बचालो तुम।

ऐ भारत के सजग युवाओ!
इक रानी की बात नहीं।
पन्ना, जोधा पदमावत को,
फिल्माने की बात नहीं।

बात सिर्फ है स्वाभिमान की,
सत्य सनातन वो ज्योती।
उसपे घात करे कोई तो,
हमसे सहन नहीं होती।

Wednesday, November 1, 2017

यादें ... फिर से...

........****मेरी कलम से*****.....

ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात है जब वो चुपके से पास मेरे आया करती थी,
जबकि बर्षों गुजर गए जब वो आकर बाहों में मेरी सिमट जाया करती थी।

क्या थी उसकी मजबूरी जो उसने यूँ बीच राह छोड़ दिया हमको,
जो कभी हर कदम साथ मेरे बढ़ाया करती थी,

लाखों कोशिश करता हूँ मैं उसे भुलाने की पर भूल नहीं पाता उसकी वो हँसी,
जब दिऐ *दीवाली* के जलाकर वो खिलखिलाया करती थी।

कैसे भुलाऊँ सर्दियों की सुबहें जब बैठकर सीढ़ियों पर मंदिर की,
वो कसमें प्यार की खाया करती थी।

इतनी उदास है जिंदगी की पता ही नही लगता खुशियाँ हैं भी या नही है जिंदगी में,
दौर वही याद आता है जब वो सिर रखकर अपना मेरे सीने पर सो जाया करती थी।

तू ही बता दे ऐ रब मेरे कैसे मिटायूं उस मंजर को अपनी इन आंखों से,
जब वो दूर से बाहें फैलाकर "मानस" को बुलाया करती थी।।

Wednesday, July 19, 2017

Bhav taarif

Awsm eyes...
ये निगाहों का क़सूर है या क़सूर है तेरी अदाओं का,
लाखों मर चुके हैं और लाखों का मरना बाकी है...

Saturday, June 24, 2017

Bhav...

Usne Aakhri mulaqat karke meri zindagi ki raat kardi..

Abhi thik se usko jana bhi nhi tha ki usne jane ki baat krdi,

Jise naaz tha gurbat pe meri...
Usne shaan paiso ki dikha kar zahir meri aukaat kardi.

Jiske Lhje me sirf hum tum hua karte the...
Aaj usne sharminda mujhe puch kr meri zaat kardi..

Jiski chahat me maine zamana chhoda..

Aaj usne mujhe chhod kar whi siyasat mere saath kardi..

Tuesday, March 7, 2017

Khyal-e-zindgi

ज़ख्मों के साथ जोखिम नहीं लेने चाहिए

पुरानी यादों के रहते नये खयालात नहीं बनाने चाहिए।

दिल लगाना सिर्फ दिल्लगी नहीं होती ऐ हमदम ,

महबूब की बेवफाई को अपनाना भी आना चाहिए...