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Wednesday, November 1, 2017

यादें ... फिर से...

........****मेरी कलम से*****.....

ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात है जब वो चुपके से पास मेरे आया करती थी,
जबकि बर्षों गुजर गए जब वो आकर बाहों में मेरी सिमट जाया करती थी।

क्या थी उसकी मजबूरी जो उसने यूँ बीच राह छोड़ दिया हमको,
जो कभी हर कदम साथ मेरे बढ़ाया करती थी,

लाखों कोशिश करता हूँ मैं उसे भुलाने की पर भूल नहीं पाता उसकी वो हँसी,
जब दिऐ *दीवाली* के जलाकर वो खिलखिलाया करती थी।

कैसे भुलाऊँ सर्दियों की सुबहें जब बैठकर सीढ़ियों पर मंदिर की,
वो कसमें प्यार की खाया करती थी।

इतनी उदास है जिंदगी की पता ही नही लगता खुशियाँ हैं भी या नही है जिंदगी में,
दौर वही याद आता है जब वो सिर रखकर अपना मेरे सीने पर सो जाया करती थी।

तू ही बता दे ऐ रब मेरे कैसे मिटायूं उस मंजर को अपनी इन आंखों से,
जब वो दूर से बाहें फैलाकर "मानस" को बुलाया करती थी।।

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